06 दिसम्बर 2007
वार्ता
चेन्नई। मद्रास उच्च न्यायालय ने अखिल भारतीय अन्ना द्रविड मुनेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) के तीन कार्यकर्ताओं को मिली मौत की सजा आज बरकरार रखी। इन्हें वर्ष 2000 में तमिलनाडु के धरमपुरी शहर में बस जलाए जाने के मामले में निचली अदालत ने यह सजा सुनाई थी।
उल्लेखनीय है कि इस घटना में कॉलेज की तीन छात्राओं की मौत हो गई थी।
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति डी. मुरुगेसन और न्यायमूर्ति वी. पेरियाकरुप्पिया की खंडपीठ ने अन्नाद्रमुक के तत्कालीन धरमपुरी शहर के सचिव नेदू उर्फ नेदूनचेझियान, एमजीआर फोरम के कार्यकर्ता मधी उर्फ रविचंद्रन तथा पूर्व पंचायत अध्यक्ष पी. मुनियाप्पन को दोषी ठहराया है। खंडपीठ ने इन लोगों को मौत की सजा देने के सलेम के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के 16 फरवरी के आदेश को सही ठहराया।
उच्च न्यायालय ने इस मामले में 25 अन्य आरोपियों को भी दोषी ठहराते हुए, उन्हें सात सालों का सश्रम कारावास की सजा देने के निचली अदालत के आदेश को भी सही माना है।
मामले में बरी करने की मांग करते हुए आरोपियों द्वारा दायर याचिका पर न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ने इस मामले को पूरी तरह साबित कर दिया है।
खंडपीठ ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों और परिस्थितिजन्य साक्ष्य से भी आरोपी पूरी तरह दोषी सिद्ध हो चुके हैं।
घटना-
02 फरवरी 2000 को उग्र अन्नाद्रमुक कार्यकर्ताओं ने एक शैक्षणिक टूर से कोयंबटूर से लौट रही तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की छात्राओं से भरी एक बस में आग लगा दी थी, जिससे तीन छात्राओं की मौके पर ही मौत हो गई थी।
‘कोडिकनाल प्लीजेंट स्टे होटल मामले’ में अन्नाद्रमुक प्रमुख जे. जयललिता को विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराने से नाराज पार्टी के कार्यकर्ता 2 फरवरी को तोड़फोड़ करने लगे थे।
प्रारंभ में इस मामले की सुनवाई कृष्णागिरि की अदालत में हुई, लेकिन अधिकतर गवाह वहां पलट गए।
इस कांड में मारी गई छात्राओं में से एक छात्रा कोकिलवानी के पिता ने इसके बाद उच्च न्यायालय में अपील कर इस मामले की सुनवाई कृष्णागिरि अदालत से किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया।
इसपर उच्च न्यायालय ने इस मामले को सेलम की अदालत में स्थानांतरित कर दिया था, जहां इसकी फिर से सुनवाई हुई। इसके बाद सेलम की अदालत ने तीन आरोपियों को मौत की सजा और 25 अन्य आरोपियों को सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे उच्च न्यायालय ने आज बरकरार रखा।