07 जनवरी 2009
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फिल्‍म समीक्षा: खामियों से भरी ‘ईएमआई’
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07 नवम्बर 2008
indiafm.com
तरण आदर्श


फिल्मः- ईएमआई
निर्देशकः- सौरव काबरा
कलाकारः- संजय दत्त, उर्मिला मातोंडकर, अर्जुन रामपाल, मलाइका अरोड़ा खान, आशीष चौधरी, कुलभूषण खरबंदा आदि।

आजकल कर्ज लेने की परिपाटी जोरों पर है। किसी न किसी तरीके से लोग कर्ज लेने के लिए मजबूर है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिल्म ‘ईएमआई’ बिल्कुल सटीक है। इस फिल्म से निर्देशन के क्षेत्र में उतर रहे सौरव काबरा ने असल जिन्दगी से कुछ कहानियों को लेते हुए कर्ज लेने के फायदे और नुकसान को उजागर किया है।

‘ईएमआई’ में चार कहानियां समानांतर रूप से चलती है। लेकिन इन कहानियों के बीच एक कड़ी है ‘भाई’। जो न केवल लोगों से कर्ज का बकाया वसूलता है, बल्कि उनकी निजी जिन्दगी की परेशानियों को भी सुलझाता है। अफसोस की बात यही है कि कहानी के अनुरूप फिल्म को दिया गया शीर्षक सटीक नहीं है।

तस्वीरों में:- संजय दत्त की ‘ईएमआई’

फिल्म की शुरुआत दिलचस्प तरीके से होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह पूरी मसाला फिल्म बन जाती है, जहां कर्ज वसूलने वाला भाई लोगों की भलाई की कोशिश करता है।

दिलचस्प बात तो यह है कि फिल्म के दूसरे भाग तक आते-आते लोगों से कर्ज का बकाया वसूलने वाले ‘भाई’ को एक ऐसी लड़की से प्यार हो जाता है, जो खुद कर्जे में डूबी हुई है। जाहिर है फिल्म की कहानी जिस दिशा में शुरु होती है, उससे बिल्कुल ही अलग दिशा में जाकर खत्म होती है।

‘ईएमआई’ के शुरुआती और बाद के दृश्यों में भले ही संतुलन नहीं हो, लेकिन संजू बाबा यानी संजय दत्त ‘भाई’ के किरदार में लोगों को जरूर भाएंगे।

सत्तार (संजय दत्त) ‘गुड लक रिकवरी एजेंसी’ के मालिक हैं, और ऐसे लोगों के लिए अवतार है, जो कर्जे में डूबे होते हैं। ‘भाईगिरी’ से लेकर व्यवसाय और यहां तक की राजनीति के साथ-साथ समाज सेवा जैसे जीवन के सभी पहलू में सत्तार भाई आगे बढ़ना चाहते हैं।

पढ़ें:- संजय दत्त को ‘ईएमआई’ से बहुत उम्मीदें

केवल बैंक ही नहीं, बल्कि टेलीकॉम कम्पनियां और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा अपना काम निकालने के लिए सत्तार भाई (संजय दत्त) की ‘गुड लक रिकवरी एजेंसी’ चहेती बन चुकी होती है। धंधे के मामले में सत्तार भाई की एक ही नीति होती है कि ‘अगर कर्जा लिया है, तो चुकाना पड़ेगा।’

देखना यह है कि कर्जा वसूलने के मामले में सत्तार भाई की ये नीति क्या तब कामयाब हो पाती है, जब उनका पाला अनिल-शिल्पा (आशीष चौधरी-नेहा ओबेरॉय), चंद्रकांत-अर्जुन (कुलभूषण खरबंदा), रेयान-प्रेरणा (अर्जुन रामपाल-मलाइका अरोड़ा खान) और प्रेरणा (उर्मिला मातोंडकर) जैसे लोगों से पड़ता है।

पैसों की किल्लत? मकान चाहिए? कार खरीदनी है? विदेश की सैर? आज इन सब चीजों को बस कर्ज लेकर पूरा किया जा सकता है। वित्तीय प्रतिष्ठानों द्वारा कभी वक्त-बेवक्त किए जाने वाले फोन, चिकनी-चुपड़ी बातें और हसीं ख्वाब दिखा कर ये लोगों को कर्जा लेने के लिए बाध्य कर देते हैं। फिल्म ‘ईएमआई’ ने असल जिन्दगी की इसी हकीकत को पर्दे पर उतारा है।

पढ़ें:- असली ‘सत्तारभाई’ बन गए संजय दत्त!

फिल्म ‘ईएमआई’ की कहानी जैसे-जैसे कड़वे सच के साथ नाटकीय होती चली गई है, वैसे-वैसे फिल्म कमजोर होती गई है। लेकिन दूसरे हिस्से में फिल्म के कुछ दृश्य बहुत बेजोड़ लगते हैं और इसका पूरा श्रेय जाता है संजय दत्त को।

निर्देशक सौरव काबरा ने बिल्कुल सही विषय का चुनाव किया है, लेकिन पटकथा थोड़ी कमजोर है। चिरंतन भट्ट द्वारा दिया गया संगीत भी ठीक-ठाक बन पड़ा है। कहीं-कहीं संवाद दमदार बन पड़े हैं।

फिल्म ‘किडनैप’ के बाद ‘ईएमआई’ में संजय दत्त का अभिनय और निखर कर आया है। संजू के बिना ये फिल्म बिल्कुल ही बेजान है। अर्जुन रामपाल का अभिनय सजीव बन पड़ा है, जबकि उर्मिला का प्रदर्शन निराश करता है। आशीष चौधरी और नेहा ओबेरॉय का अभिनय भी दमदार नहीं है।

पढ़ें:- दीवाली की दौड़ से ‘ईएमआई’ बाहर

‘भाईगिरी’ की इस दुनिया की वास्तविकता में उजागर करने में मनोज जोशी, स्नेहल धाबी और दयाशंकर पांडे ने बेहतरीन काम किया है।

कुल मिलाकर फिल्म ‘ईएमआई’ में कुल दिलचस्प मोड़ है, और कहीं कुछ खामियां है।

रेटिंग: *1/2

*(खराब), **(ठीक), *** (अच्छी), **** (बहुत अच्छी), *** **(सर्वोत्कृष्ट)


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07 जनवरी 2009
Nov 07, 2008
अरे यार तरुण तू क्या पागल हो गया है?पूरए रेविएव मे तूने बोला की सिनेमा इता ख़राब नहीं हे,फिर राटींग इतनी क्म क्यूं?
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