22 नवम्बर 2008
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‘बचना ऐ हसीनो’ की पटकथा कमजोर
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17 अगस्‍त 2008
indiafm.com
तरण आदर्श


निर्माता: आदित्‍य चोपड़ा
निर्देशक: सिद्धार्थ आनंद
सितारे: बिपाशा बसु, रणवीर कपूर, दीपिका पादुकोण, मिनीषा लांबा व अन्‍य

‘बचना ऐ हसीनो’ कई कारणों से एक विशेष फिल्म है। इसमें रणवीर कपूर तीन देवियों बिपाशा बसु, दीपिका पादुकोण और मिनीषा लांबा के साथ नजर आते हैं। निर्माता आदित्‍य चोपड़ा तथा निर्देशक सिद्धार्थ आनंद (इसके पहले ‘सलाम नमस्‍ते’ और ‘तारा रम पम पम’ बना चुके हैं) की वजह से इस फिल्‍म से कुछ अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं।

एक और बात बता दें कि ‘बचना ऐ हसीनो’ अंग्रेजी फिल्म ‘द बैचलर’ या फिर 1965 की हिंदी फिल्म ‘तीन देवियां’ से प्रेरित नहीं है।

इस फिल्म में पात्र बढ़िया हैं, सबके बीच का तालमेल भी अच्छा है, दृश्य काफी मनोरम हैं, लेकिन ये सारी बातें मिलकर भी किसी फिल्म को बेहतर नहीं बना सकती। ‘बचना ऐ हसीनो’ की सबसे कमजोर कड़ी है दूसरे भाग में उसकी ढीली पड़ती पटकथा।

इस फिल्म की कहानी आकर्षक है, जिसमें एक दिलफेंक लड़का है। इस लड़के की जिंदगी में अलग-अलग मोड़ पर तीन लड़कियां आती हैं। तीन में दो उससे शादी करना चाहती हैं, लेकिन लड़का उन्हें धोखा देता है और तीसरी, जिससे वह शादी करना चाहता है, वह उसे साफ ‘ना’ कह देती है। टूटे हुआ दिल लेकर लड़का प्रायश्चित करना चाहता है और इसके लिए वह पिछली दो लड़कियों के पास जाकर माफी मांगता है।

पहले घंटे में ‘बचना ऐ हसीनो’ में काफी अच्छी दृश्य हैं। बल्कि तीन कहानियों को पहले घंटे में काफी दिलचस्पी के साथ बताया गया है। इस समय इसमें कुछ ऐसे दृश्य हैं जो आपका ध्यान खींच लेंगे।

दूसरे भाग में लड़का अपनी गलतियों पर पछतावा करता है और बाकी दो लड़कियों से माफी मांगने जाता है और यहीं पर कहानी कमजोर पड़ जाती है।

लेखन की दृष्टि से देखें तो पहली कहानी, जो मिनीषा लांबा के साथ है, उसे दूसरे भाग में भी काफी सटीक तरीके से आगे बढ़ाया गया है। लेकिन इसके अलावा बाकी की कहानियां कमजोर पड़ जाती हैं। अधिकतर हिंदी फिल्मों की तरह इस फिल्म की कहानी भी लेखन की कमजोरी से मार खा जाती है।

मिलिए राज (रणवीर कपूर) से जो अपनी जिंदगी में तीन बार प्यार में पड़ते हैं।

फिल्म में तीन प्रेम कहानियां हैं- राज और माही (मिनीषा), राज और राधिका (बिपाशा) और राज और गायत्री (दीपिका)। तीनों ही अपने प्यारे, मदमस्त और अनोखे अंदाज में राज को प्यार सिखाती हैं।

निर्देशक सिद्धार्थ आनंद रूमानी और भावनात्मक दृश्यों को काफी काबलियत से अंजाम देते है। जैसे हवाई अड्डे का वह दृश्य ले लें, जिसमें मिनीषा, रणवीर की ‘जीत हासिल’ करने की कहानियों को सुन लेती है और उसके गालों पर आंसुओं की धारा बहने लगती है। उसकी चुप्पी सब कुछ कह जाती है।

उस दृश्य को भी ले लें, जिसमें रणवीर बिपाशा के पीछे भागता हैं, लेकिन एक खास दिन उसे छोड़कर भाग लेता है। लगातार बरसात होती रहती है और बिपाशा अपने सदमे से बाहर ही नहीं आ पाती है। इसमें भी खामोशी सब कुछ बयां कर जाती हैं। लेकिन प्रेम कहानी यहां खत्म नहीं होती। दीपिका रणवीर के शादी प्रस्ताव को ठुकरा देती है। और तब अतीत की कुछ यादें फिर से ताजा हो जाती हैं और यह दृश्य काफी अच्छी लगते हैं।

मध्यांतर के बाद रणवीर के शादीशुदा मिनीषा से माफी मांगने के दृश्य काफी अच्छे बन पड़े हैं। लेकिन गड़बड़ी तब से शुरू होती है जब रणवीर बिपाशा को मनाने जाते हैं। बिपाशा एक घायल शेरनी की तरह है, जिसके सामने माफी से कोई काम नहीं बनता। रणवीर के मनाने का भी उस पर कोई असर नहीं होता। यहां तक भी कहानी ठीक जाती है लेकिन रणवीर को सबक सिखाने के लिए जो तरीके बिपाशा अपनाती है वह काफी अजीब लगते हैं।

तीसरी कहानी दीपिका के साथ है, जिसे देखकर लगता है कि यह कहानी काफी जल्दबाजी में लिखी गई है। अचानक ही रूठी हुई दीपिका रणवीर से शादी करने को तैयार हो जाती है और उसके शहर में न होने के बावजूद उसे खत लिखती है। इस कहानी को काफी अपरिपक्वता से बनाया गया है और ऐसी लगता है कि दो घंटे खत्म हो जाने पर बस कहानी को किसी तरह खत्म करने में जल्दबाजी की गई है।

निर्देशक के तौर पर सिद्धार्थ राज आनंद दृश्यों में जान भर देते हैं और कलाकारों से भी बेहतर काम लेने में कामयाब हुए हैं। लेकिन पटकथा काफी निराश करती है। ‘खुदा जाने’ और ‘लकी बॉय’ के अलावा कोई भी गाने गुनगुनाने के लायक नहीं। छायांकन काफी अच्छा है। फिल्म के संवाद कुछ जगहों पर अच्छे हैं।

रणवीर कपूर काफी उम्दा अभिनेता हैं। इस फिल्म में उनके अभिनय की तारीफ करने के लिए शब्द भी कम पड़ते हैं। तीनों में से बिपाशा काफी प्रभावी लगती हैं। ‘रेस’ के बाद अब ‘बचना ऐ हसीनों’ में बिपाशा ने अपनी खूबसूरती और अभिनय की मिसाल कायम की है।

मिनीषा शुरुआत में ठीक-ठाक हैं, लेकिन भावनात्मक दृश्यों में (खासकर दूसरे भाग में) वे काफी प्रभावशाली रही हैं। दीपिका सबसे कमजोर हैं, शायद इसलिए भी कि उन्हें भूमिका उतनी मजबूत नहीं दी गई। बस उनका सबसे मजबूत पक्ष है उनकी सुंदरता।

कुणाल कपूर अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय करते हैं। हितेन पेंटल के अभिनय को देखकर उनसे काफी अपेक्षा बनती हैं। रणवीर के साथ उनकी दोस्ती देखने लायक है।

अगर देखा जाए तो ‘बचना ऐ हसीनो’ का पहला भाग काफी दिलचस्प है, लेकिन दूसरा भाग उतना ही कमजोर। बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा प्रचार के कारण शुरुआत अच्छी मिल सकती है, लेकिन यह लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी।

रेटिंग: **1/2

*(खराब), **(ठीक), *** (अच्छी) **** (बहुत अच्छी), *** **(सर्वोत्कृष्ट)

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22 नवम्बर 2008
Aug 17, 2008
ओँल्य फ़ोर सोंग उ कन वतच. ओतेरविसे ओँल्य फ़ोर हेरो ओफ़ तीस फ़िल्म आंड अल्सो बिपाशा.
aditya noida
Aug 17, 2008
शाहरुख़ ने जो फ़िल्म फ़ेयर में समीक्षकों के बारे में जो कहा था वोह एकदम सही है| सारी दुनिय को मूवी अच्छी लग रही है, लोग 4 रेटिंग से नीचे नहीं दे रहे है| और ये महाशय 2.5 दे रहे हैं| ये तो ऐसा लगता है जैसे इन्हें किसीसे पैसे मिलें हों ज़बरदस्ती ख़राब समीक्षा करने के|
Ashish Bangalore
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