06 जनवरी 2009
बड़ी खबरें:
किताबी दुनिया  »  लोक कथा  »  नवरात्रि व्रत की महिमा
नवरात्रि व्रत की महिमा
ads by google
 (पुराण:  वेद और पुराण हिंदू धर्म की अमूल्य निधि हैं। जन्म से मृत्यु तक के हमारे संस्कार इन्हीं वेदों और पुराणों की परंपरा पर आधारित हैं। पुराणों की संख्या अठ्ठारह कही गई है। इनमें विभिन्न व्यक्तियों, वस्तुओं, जीवों आदि को आधार बनाकर शिक्षा और ज्ञान का महत्व बताया गया है। कहानियों-कथाओं के जरिए सही और गलत में अंतर बताया गया है। पुराण ज्ञान और शिक्षा के साथ मनोरंजन का भी भरपूर खजाना है। यही कारण है कि लोग इसे आज के समय में भी पढ़ना पसंद करते हैं।)

www.diamondpublication.com

नवरात्रि व्रत की महिमा

कौशल देश में सुशील नामक का एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। प्रतिदिन मिलने वाली भिक्षा से वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसके कई बच्चे थे। प्रातःकाल वह भिक्षा लेने घर से निकलता और सायंकाल लौट आता था।

देवताओं, पितरों और अतिथियों की पूजा करने के बाद आश्रितजन को खिलाकर ही वह स्वयं भोजन ग्रहण करता था। इस प्रकार भिक्षा को वह भगवान का प्रसाद समझकर स्वीकार करता था।

इतना दुःखी होने पर भी वह दूसरों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहता था। यद्यपि उसके मन में अपार चिंता रहती थी, तथापि वह सदैव धर्म-कर्म में लगा रहता था। अपनी इन्द्रियों पर उसका पूर्ण नियंत्रण था। वह सदाचारी, धर्मात्मा और सत्यवादी था। उसके हृदय में कभी क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या जैसे तुच्छ विकार उत्पन्न नहीं होते थे।

पढ़ें:
  सृष्टि का निर्माण

एक बार उसके घर के निकट सत्यव्रत नामक एक तेजस्वी ऋषि आकर ठहरे। वे एक प्रसिद्ध तपस्वी थे। मंत्रों और विद्याओं का ज्ञाता उनके समान आस-पास दूसरा कोई नहीं था। शीघ्र ही अनेक व्यक्ति उनके दर्शनों को आने लगे। सुशील के हृदय में भी उनसे मिलने की इच्छा जागृत हुई और वह उनकी सेवा में उपस्थित हुआ।

सत्यव्रत को प्रणाम कर वह बोला-“ऋषिवर! आपकी बुद्धि अत्यंत विलक्षण है। आप अनेक शास्त्रों, विद्याओं और मंत्रों के ज्ञाता हैं। मैं एक निर्धन, दरिद्र और असहाय ब्राह्मण हूँ। कृपया मुझे बताएँ कि मेरी दरिद्रता किस प्रकार समाप्त हो सकती है?”

सत्यव्रत ने आगे कहा कि, “मुनिवर! आपसे यह पूछने का केवल इतना ही अभिप्राय है कि मुझ में कुटुम्ब का भरण-पोषण करने की शक्ति आ जाए। धनाभाव के कारण मैं उन्हें समुचित सुविधाएँ और अन्य सुख नहीं दे पा रहा हूँ। दयानिधान! तप, दान, व्रत, मंत्र अथवा जप-आप कोई ऐसा उपाय बताने का कष्ट करें, जिससे कि मैं अपने परिवार का यथोचित भरण-पोषण कर सकूँ। मुझे केवल इतने ही धन का अभिलाषा है, जिससे कि मेरा परिवार सुखी हो जाए।”

सत्यव्रत ने सुशील को भगवती दुर्गा की महिमा बताते हुए नवरात्रि व्रत करने का परामर्श दिया। सुशील ने सत्यव्रत को अपना गुरु बनाकर उनसे मायाबीज नामक भुवनेश्वरी मंत्र की दीक्षा ली। तत्पश्चात नवरात्रि व्रत रखकर उस मंत्र का नियमित जप आरम्भ कर दिया। उसने भगवती दुर्गा की श्रद्धा और भक्तिपूर्वक आराधना की।

पढ़ें:  लक्ष्मी का वास  

नौ वर्षों तक प्रत्येक नवरात्रि में वह भगवती दुर्गा के मायाबीज मंत्र का निरंतर जप करता रहा। सुशील की भक्ति से प्रसन्न होकर नवें वर्ष की नवरात्रि में, अष्टमी की आधी रात को देवी भगवती साक्षात प्रकट हुईं और सुशील को उसका अभीष्ट वर प्रदान करते हुए उसे संसार का समस्त वैभव, ऐश्वर्य और मोक्ष प्रदान किया।

इस प्रकार भगवती दुर्गा ने प्रसन्न होकर अपने भक्त सुशील के सभी कष्टों को दूर कर दिया और उसे अतुल धन-सम्पदा, मान-सम्मान और समृद्धि प्रदान की। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी कार्य को श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा से करने पर उसका फल सदैव अनुकूल ही प्राप्त होता है।

(साभारः पुराणों की कथाएं, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)


ads by google
यह खबर आपको कैसी लगी
10 में से 5 वोट मिले
पाठकों की राय
06 जनवरी 2009
Jan 01, 2009
यहे कहानी शारदा ओर विसवास की है ओर मुझे बहुत भाड़िया लगी. " जै माता दी "
Girish Ajmer
Dec 23, 2008
जो इसमे कहा गया है वो सत्य है
rubi barabanaki
Nov 22, 2008
उत्तम जानकारी के लिए धञयबाद आगे वेदों की जानकारी दें
pramod kumar chandel sagar mp
सम्बंधित ख़बरे - लोक कथा
प्रमुख ख़बरें
आज के वीडियो
उमर अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री पद संभाला
उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
सेंसेक्स 317 अंक चढ़कर बंद
शेयर बाजारों की अच्छी छलांग।
आमिर से डरने लगे हैं जॉन अब्राहम!
जॉन फिल्‍म ‘गजनी’ में आमिर खान की बॉडी देखकर घबरा गए।
© 2007, Web18 Software Services Ltd. All Rights Reserved.