(भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। पंचतंत्र उनमें प्रमुख है। पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया। इस किताब में जानवरों को पात्र बना कर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं।) www.diamondpublication.com
कुपात्र को उपदेशकिसी पर्वतीय प्रदेश में वानरों का एक समूह निवास करता था। एक वर्ष हेमन्त ऋतु में भयंकर वायु चलने लगी। उसके साथ ही वर्षा आरम्भ हुई और हिमपात भी होने लगा। ठंड से व्यथित होने के कारण वानर समूह शरण पाने के लिए इधर-उधर भटकता रहा, किन्तु उनको कहीं भी कोई सुरक्षित स्थान नहीं मिल पाया।
पढ़ें: कैसे बना वाराह तीर्थः वेदों से कुछ वानरों ने कहीं से लाल-लाल गुंजा के फल बीने और उनको एकत्रित कर उनके चारों और बैठ गए। उन्हें लगा कि ये अग्निकण हैं और अब इनके आश्रय से उनकी ठंड मिट जाएगी।
सूचीमुख नाम का एक पक्षी उनके इस व्यर्थ प्रयास को देख रहा था। उसने कहा, “लगता है तुम लोग निपट मूर्ख ही हो। ये अग्निकण नहीं, गुंजाफल हैं। इनसे ठण्ड नहीं मिटेगी। कहीं किसी सुरक्षित स्थान की खोज करो। किसी पर्वत-कन्दरा में जाकर छिप जाओ, वर्षा रुकने वाली नहीं है।”
पढ़ें: हितैषियों का साथ तब एक वानर बोला, “तुम्हें इससे क्या, तुम अपना रास्ता नापो।” सूचीमुख कहीं नहीं गया और उनको बार-बार समझाता ही रहा।
बार-बार उसकी बात को सुनकर एक वानर को क्रोध आ गया और उसने उसको पकड़कर वहीं शिला पर पटककर मार दिया। इस कथा से यह सीख मिलती है कि अयोग्य को शिक्षा देने का कोई लाभ नहीं है। सर्प को दूध पिलाने से उसका विष बढ़ता ही है, शान्त नहीं होता।
(साभारः पंचतंत्र की कहानियां, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)