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(हमारी लोककथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चली आ रही हैं। इनमें भारत की सांस्कृतिक एकता और धार्मिक मान्यताओं की सुंदर झलक देखने को मिलती है। दरअसल, कथाएँ बच्चों की सूझ-बूझ विकसित करने और उनकी मानसिक क्षुधा शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती साथ ही सामाजिक मूल्य और भारतीय संस्कारों के प्रति चेतना भी जाग्रत होती है।)नकल के लिए अकलबहुत समय पहले की बात है। त्रिपुरा में लोगाड़ी नदी के किनारे कुछ कूकी नागा परिवार रहते थे। उभरे गालों की हड्डियों और छोटी-छोटी आँखें देखकर कोई भी इन्हें पहचान सकता था। स्त्रियों की केश-सज्जा तो देखते ही बनती थी।
बाँस और मिट्टी की झोंपड़ियों में रहने वाली यह जाति बहुत बहादुर और शांतिप्रिय थी। इन्हीं लोगों में एक गरीब लड़का भी रहता था। उसका नाम था ‘मागुरा’। वह बस्ती से दूर एक झोपड़ी में रहता था। जानवरों से उसे बहुत प्यार था।
जंगली जानवर उसे कभी नुकसान नहीं पहचानते थे। एक दिन मागुरा जंगल में शिकार खेलने गया। शिकार की तलाश में वह दूर तक निकल गया। जब सांझ ढलने लगी तो उसने जंगली फल खाकर पानी पिया और एक पेड़ के नीचे लेट गया। कुछ समय बाद उसी पेड़ पर बंदरों का एक झुंड आ पहुँचा। उन्होंने मागुरा के हथियार देखे तो जान गए कि उसे शिकार नहीं मिला।
दयालु बंदरों ने आपस में सलाह की-‘क्यों न हम इस व्यक्ति की मदद करें?’ उन्होंने नदी से कुछ मछलियाँ पकड़ीं और मागुरा का थैला भर दिया। मागुरा गहरी नींद में था। बहुत देर तक जब वह नहीं जगा तो बंदरों का दल एक बार फिर विचार करने लगा।
उनका नेता बोला-‘लगता है, बेचारा मर गया। देखो, हिल भी नहीं रहा है।’ दूसरे बंदर ने सलाह दी, ‘इसे गाँव में छोड़ आना चाहिए। लोग इसका क्रियाकर्म कर देंगे।’ उदास और भारी मन लिए बंदरों ने मागुरा और उसके थैलों को उठाया तथा चल दिए। सारे रास्ते मागुरा बेसुध सोता रहा।
जब बंदरों ने उसे दरवाजे पर उतारा तो उसकी आँख खुली। बंदर-दल बिना किसी शोर के लौट गया। मागुरा ने मछलियों से भरा थैला देखा तो बंदरों को जी भरकर धन्यवाद दिया। शाम को उसके अपनी साथी बौंगसा को सारी घटना सुनाई।
पढ़ें: आ भालू मुझे मार बौंगसा बहुत आलसी था। उसने सोचा-‘क्यों न मैं भी मागुरा की तरह पेड़ के नीचे जाकर सो जाऊँ। बंदर मेरी भी थैली भरकर, मुझे घर पहुँचा देंगे?’ बस शाम होते ही वह भी उसी पेड़ के नीचे बहाना बनाकर लेट गया। बंदर-दल ने उसके लिए भी मछलियाँ पकड़ीं।
जब कुछ देर बौंगसा शांत पड़ा रहा तो एक बंदर बोला-‘लगता है, सारे गाँव के व्यक्ति यहीं आकर मरेंगे। हमें सबको घर पहुँचाना होगा। एक बंदरिया तो जवान मौत पर आँसू बहाने लगी। उसे चुप कराकर बंदरों ने बौंगसा को उठाया और चल दिए। पहाड़ की चोटी पर पहुँचे तो बौंगसा घबराया कि कहीं बंदर उसे नीचे न गिरा दें।
वह आँखें बंद किए बोला-‘भई, जरा ध्यान से ले चलो, चोट न लग जाए।’ बंदर-दल के नेता ने बौंगसा की आवाज सुनी तो सब कुछ समझ गया। उसे बौंगसा की चालाकी पर बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने उस आलसी को धम्म से पटक दिया और उसकी पिटाई करने लगे।
जब बौंगसा फटेहाल हो गया तो बंदरों ने मछलियाँ उठाईं और लौट गए। बौंगसा रोता-कलपता घर पहुँचा तो राह में मागुरा मिल गया। उसने हाल पूछा तो बौंगसा फटे कपड़े दिखाकर बोला-‘नकल के लिए भी अकल चाहिए, यह मैंने आज जाना।’
(साभार: भारत की लोक कथाएं, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)