18 नवम्बर 2008
व्यंग्य
जुगनू शारदेय
सारे गैर-हिंदू आतंकवादी डर के मारे कांप रहे हैं। अब आतंकवादियों को भय पुलिस–उलिस से नहीं है। अपनी हरकतों से उन्हें मालूम है कि उनकी हरकत के बाद ही पुलिस हरकत में आती है। फोटू छप जाने के बाद पुलिस अपने काम में लग जाती है। क्या यह भी बताने की आवश्यकता है कि पुलिस क्या करती रहती है।
गैरहिंदू आतंकवादी इस लिए डर से कांप रहे हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव का नतीजा तो 8 दिसंबर को आएगा। पर भाजपा ने मान लिया है कि जीतेगी भाजपा, हारेगा आतंक। हिंदू आतंकवादी सोच रहे हैं कि कैसे उनका आतंकवाद देश में हिंदू राज्य लाएगा। तब भी क्या हारेगा आतंक कहा जाएगा।
भाजपा ने बहुत पहले से आतंक का धार्मिककरण कर दिया है। जैसे कांग्रेस ने पता नहीं क्यों आतंक का हिंदूकरण कर दिया है। यहां कांग्रेस का मतलब राष्ट्र के मन्नू भाई मुनीम नहीं हैं। वह तो उस आतंकवाद के शिकार हैं जिसके वह जन्मदाता हैं उनका आतंकवाद आर्थिक आतंकवाद है।
आर्थिक आतंकवाद से निपटने के लिए न जाने वह क्या-क्या करते रहते हैं। जो कुछ नहीं कर सकते उन गया गया बुश के निमंत्रण पर अमेरिका तक हो पाते हैं। तरलता की नहर में डुबकी लगाते हैं। अपनी ही नीतियों के प्रवाह में बह जाते हैं। जो है ही नहीं उससे डर जाते हैं।
अमेरिकी ऑटो उद्योग में छायी मंदी है। हमारे यहां यह बढ़ रही है। दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थ सस्ता होता जा रहा है। लेकिन हमारे यहां कीमत घट नहीं रही है। पुराना घाटा जो पूरा करना है। सरकार देती है इस पर सबसिडी। अच्छी इकॉनामी है कि जिस पर देतो हो सबसिडी उससे कमाई भी करो।
अमेरिका भी महाराष्ट्र होता जा रहा है। कह रहा है कि पहले अमेरिकी को मिले नौकरी फिर बाहर वालों को काम दो। अमेरिकि आउटसोर्सिग बंद तो हमारे यहां ढेर सारे काम धंधे बंद। जब रुपया मजबूत हुआ था तब भी हुआ था हमारे यहां भी हुआ था निर्यात का काम बंद। अमेरिकी मंदी के बावजूद डॉलर मजबूत हुआ तो भी काम बंद।
मन्नू भाई मुनीम की इकॉनॉमी अमेरिका पर निर्भर है। अपनी आत्मनिर्भरता उन्होंने इतनी घटाई कि देश की इकॉनॉमी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना हो कर रह गई। जहां से चले थे, वहीं पर खड़े हैं। परमाणु बिजली के पीछे पड़े हैं। चांद पर पहुंच गए हैं। इसलिए धरती से पैर उखड़े हैं।
न जाने कितनी तरक्की हम कर चुके। चुनाव के वक्त बिजली, पानी और सड़क के लिए लड़ रहे हैं। दिल्ली में आतंक से और मुंबई में बिहारियों से लड़ रहे हैं। अपनी महंगाई से ज्यादा दुनिया की मंदी से लड़ रहे हैं। कौन बड़ा झूठ बोलता है चुनाव के वक्त इस पर खूब झगड़ रहे हैं।
बस लड़ झगड़ कर मर!
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पाठकों की राय 06 जनवरी 2009
Dec 11, 2008
यह कहानी हमे बहुत अच्छी लगी धन्यवाद
raju uttranchal
Nov 20, 2008
जुगनू जी बहोत्त अच्छा
kishor aurangabad