06 जनवरी 2009
बड़ी खबरें:
हास्य-व्यंग्य  »  टिकट बिकान होय महाकल्याण
टिकट बिकान होय महाकल्याण
ads by google
12 नवम्बर 2008
 
व्यंग्य

जुगनू शारदेय


देश में दुनिया के समान मंदी है। जैसे-जैसे दुनिया में छंटनी हो रही है, वैसे-वैसे हमारे देश में भी हो रही है। अब हम कह सकते हैं कि हम दुनिया के बराबर हैं। कोई नहीं कह सकता कि हम विकासशील देश हैं।
 
हमारी अपनी अर्थ नीति है। कोई नहीं कह सकता कि अमेरिका के समान व्यर्थ नीति है। हम हम हैं। हम का हमारा कांग्रेस पार्टी है। राजकाज की पार्टी। नैतिकता और अनुशासन की पार्टी। सच को झूठ और झूठ को सच बनाने की पार्टी।

यह पार्टी टिकट बिकान के खिलाफ है। यह नीति और निर्णय देश की इकॉनॉमी के खिलाफ है। टिकट हर जगह बिकता है। बिकना भी चाहिए। टिकट बिकान पर ही देश टिका है। पर कांग्रेस पार्टी इसे नहीं मानती।
 
जरा सोचिए। सोचना क्या है। हाथ कंगन को आरसी क्या। अंग्रेजी के जमाने में फारसी क्या। टिकट कम बिकने से हवाई जहाज वाले परेशान हैं। सस्ती टिकट के कारण रेल वाले आसमान हैं।

टिकट हर जगह बिकता है। जहां टिकट नहीं बिकता, वह नेता का भाषण होता है। वह चुनाव सभा होता है। वह दिन दूर नहीं कि जब टिकट पर सेवा कर भी लगेगा। अभी भी देश में मनोरंजन कर लगता है।

नेताओं का यह मानना है कि हमारे होते किसी और किस्म के मनोरंजन की जरूरत नहीं। वह लोग महा अज्ञानी हैं जो लालू– नीतीश–पासवान के मनोरंजन के अलावा किसी और किस्म का मनोरंजन चाहते हैं।

यह लालू– नीतीश–पासवान प्रतीक मात्र हैं। इनके अलावा भी बहुत सारे लोग टिकट का कारोबार करते हैं। कुछ छिप-छिपा कर, कुछ राष्ट्र बहन के समान खुले आम दिखला कर। करते सब हैं। राष्ट्रमाता को पता होते भी पता नहीं होता।
 
राष्ट्र कुमार के पास हमेशा फालतू टिकट होता है। कब कहां नौजवानों–नौजवानियों को जरूरत पड़ जाए। अकसर ही नहीं यह हमेशा बेरोजगार होते हैं। कहां से लाएंगे टिकट खरिदने का पैसा। होता तो गोलमाल रिटर्न का फैशन होते।

ऐसे नौजवानियों को राष्ट्रकुमार मुफ्त का टिकट देते हैं। टिकट के गोलमाल को फैशनबाजी समझते हैं। बिना टिकट सिर्फ लोग रेल में और चुनाव सभाओं में जाते हैं। टिकट मिलने पर विधायिका–संसद में जाते हैं।
 
टिकट का महत्व बहुत सारे लोग नहीं समझते। यह तो खग ही जाने खग की भाषा है। यह जो पब्लिक है यह तो टिकट को रेल का, हवाई जहाज का, सिनेमा का और तरह-तरह के खेल तमाशा का टिकट भर ही मानती है।
 
टिकट का दर्द क्या होता है– यह कोई चुनाव लड़ने वाले से पूछे। इतना दर्द तो देवदास को भी पारो से बिछड़ने के बाद न हुआ था। मजनूं की तरह यह टिकट दाता गली में यह पुकारता रहता है, टिकट टिकट देखूं मैं नेता के मन में।
 
यही तो है टिकट बिकान होय महाकल्याण!


ads by google
यह खबर आपको कैसी लगी
10 में से 2 वोट मिले
पाठकों की राय
06 जनवरी 2009
सम्बंधित ख़बरे - हास्य-व्यंग्य
प्रमुख ख़बरें
आज के वीडियो
रक्तहीनता (एनीमिया) से कैसे बचें?
रक्तहीनता आजकल एक आम बीमारी बन गई है।
सेंसेक्स में बढ़त, निफ्टी गिरकर बंद
नए साल में पहली बार गिरा निफ्टी।
ट्रक मालिकों की हड़ताल जारी
हड़ताल पर सरकार सख्त रवैया अपना सकती है।
© 2007, Web18 Software Services Ltd. All Rights Reserved.