06 जनवरी 2009
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धन तंत्र के तीसमार
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10 नवम्बर 2008
 
व्यंग्य

जुगनू शारदेय


धन तंत्र के नव-निर्वाचित कुलपति आचार्य अश्वेत उन्मुक्त अत्यंत ही चिंताग्रस्त हैं। उनकी चिंता का कारण यह नहीं है कि धन तंत्र का धन कहां गया। धन तंत्र का धन और कहां जाएगा धन तंत्र में ही जाएगा।

बिना किसी प्रकार के घपला और घोटाले के धन तंत्र का धन उसी प्रकार हवा में धुंआ बनता जा रहा है जिस प्रकार धुम्रपान निषेध के दावा और कानून के बावजूद लोकतंत्र में धुम्रपान का धुंआ फैल ही रहा है।

धन तंत्र का माया जाल कुछ इस प्रकार वैश्विक हो चुका था कि लगता था कि अंतरिक्ष के पार भी इसी धन तंत्र का धन जाल फैला है। लोकतंत्र के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री भी धन तंत्र की खोज अंतर जाल में फंस चुके हैं।

जहां तक लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का प्रश्न है तो वह एक तंत्रहीन व्यक्ति हैं। वह तो परिवार तंत्र के आविष्कार हैं। परिवार के प्रति श्रद्धा और सबुरी की अभिव्यक्ति हैं। माया प्रेमी नहीं पर माया जाल ही उनकी शक्ति है।

लोकतंत्र की जनता से नहीं है उनका नाता। फिर भी माने जाते हैं अर्थतंत्र के ज्ञाता। इनके पास अर्थतंत्र संबंधी तरह-तरह के सलाहकार हैं। एक से बढ़ कर एक इनके तंत्र में तीसमार हैं।

धन तंत्र के आचार्य अश्वेत उन्मुक्त भी तीसमारों की खोज में हैं। असल में यह तीसमार ही सब कुछ करते हैं। कुछ कुछ वैसा ही है कि खल्क अमेरिका का, लोकतंत्र अमेरिकी प्रेसीडेंट का, हुक्म तीसमार का।

हर खास ओ आम को आगाह किया जाता है कि भरोसा न करें अमरीकी अर्थ तंत्र का। यह रुला के गया सपना मेरा तुम्हारा है। मंदी से जुड़ा है अब इसका नाता। फिर भी दुनिया में दादागिरी करना इसे है सुहाता।

दूसरी तरफ लोकतंत्र है। इसमें न लोक है, न तंत्र है। इसे हर प्रकार का अराजकता है भाता। लोग अराजक हुए जाते हैं। कभी परंपरा के नाम पर, कभी संस्कृति के नाम पर अपनी अपनी डफली, अपना अपना राग बजाते हैं।

यहां शेखचिल्ली बेसुरा गाना गाते हैं। अपने ही बेसुरेपन पर अपनी ही ताली बजाते हैं। वह कुत्ताघसीटी फोंफापार्टी पर बड़बोलापन बतियाते हैं। लिखे कागद कोरे पर अपनी कालिख के साथ छा जाते हैं। 

और कुछ करें या ना करें। पांच साल में एक बार चुनाव जरूर करवाते हैं। इनका सबसे बड़ा लक्ष्य चुनाव होता है। चुनाव में यह झूठ के अवतार हैं। विकास की भोथरी तलवार हैं। अपने वादे से ही गिरफ्तार हैं।

जब दुनिया यानी अमेरिका पचासे के नीचे तय करता है अपना नया अवतार तब लोक तंत्र सत्तर अस्सी के पार ढूंढता है अपना तारणहार। अमेरिकी अवतार अपने प्रशासन की बार करता है। यह बनाना चाहते हैं अपनी सरकार।

लोकतंत्र में हर जगह मिलते हैं तरह तरह के तीसमार।



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