06 जनवरी 2009
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...क्योंकि सास भी कभी आनंदी थी
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08 नवम्बर 2008
 
व्यंग्य

जुगनू शारदेय


एक सीरियल था, एक चैनल था। क्या टीआरपी थी, क्या जमाना था। कहानी सास बहू की थी–रोना धोना था। हंसना हंसाना था। हर सैटेलाइट वाले टीवी घर में इसका ही फसाना था। एक सीरियल था, एक चैनल था-क्या जमाना था।

सीरियलों का कभी भी किसी किस्म से लॉजिक से संबंध नहीं होता। यह तो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की अराजकता होती हैं। अराजकता के बहाने बिहार की राजनीति होती हैं। सीरियल तो बिहार क्या देश कि राजनीति होती है।

जैसे बिहार महाराष्ट्र की अराजक सेना के बल पर राजनीति करते हुए लोकसभा के चुनाव की तैयारी कर रहा है,वैसे ही क्योंकि कभी सास भी बहू थी अपनी कथानक में आठ साल से टीआरपी की लड़ाई लड़ता रहा है।  

जैसे बिहार का विकास नहीं हो पाता वैसे ही एकता कपूर के सीरियलों में कथानक का विकास नहीं होता। फिर भी लोग एकता कपूर का सीरियल देखते रहे। बिहार के विकास का भी सपना देखते रहे।  

एकता कपूर के सीरियल किसी को भी कुछ नहीं दे पाता। लेकिन यह नारी को सुषमा स्वराज्यीय सिंदूर से मुक्ति दिला कर एकता कपूरीय सिंदुरी टीका में जरूर बांध कर रखता है। नहीं रहा वह आठ साल पुराना रोना धोना एक चैनल पर–क्या जमाना था।

किसी न किसी चैनल पर फिर शुरु हो जाएगा देश की महिलाओं का प्रिय टाइमपास। यह तो देश की महिलाओं का सत्य है। सभ्यता का तथ्य है। हर सास कभी न कभी बहू होती ही है। बस हर बहू तुलसी नहीं होती।

जैसे हर नेता अराजक ठाकरे नहीं होता। मन से हर नेता अराजक ही होता है। अराजक न होना होता तो इस धंधे में ही क्यों आता। कोई अपनी गली का शेर बन कर उत्तर भारतीयों को भगाता है। कोई अपनी पार्टी में तमाचा मार होता है।

हमारे नेता आज कल सार्वदेशिक नहीं होते हैं। मुहल्ले का नेता राज्य का नेता माना जाता है। राज्य का नेता देश चलाता है। देश का नेता विश्व नेता कहलाता है। इसमें से कोई भी घर का नेता नहीं बन पाता है।

...क्योकि सास भी कभी बहू थी घर की नेता थी। अपने घर की राजनीति में इतनी उलझी रही कि इसे पता ही न चला कि जब यह घर में आती थी तो लोग घर के बाहर खड़े होते थे।

कभी कभी लगता है कि...क्योंकि कभी सास भी बहू थी केंद्रीय मंत्रिमंडल है। इसमें सब कुछ है पर केंद्रीय नहीं है। कभी-कभी लगता है कि केंद्र क्या यह अपनी सरकार की भी नहीं है। इसका गृह मंत्री किसी को भी नहीं सुहाता है।

अब लोगों को सुहाती है आनंदी–बालिका वधू। इसमें लोगों को अभी तिकड़म नहीं दिखता। एकता कपूर के सीरियलों में राजनीति से भी ज्यादा तिकड़म है। जबकि लोग अब थोड़ी सी मासूमियत चाहते हैं-क्योंकि सास भी कभी आनंदी थी।


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06 जनवरी 2009
Dec 16, 2008
हमे अनन्दी का किरदार बहुत पसंद आता है आई लव अनन्दी और जगगिया दादी सा ये सब हमे बहुत अच्छे लगते है
JAYA SOHTH NIKETAN
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