07 जनवरी 2009
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काका हाथरसी की चुटकियां
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तेली कौ ब्याह

भोलू तेली गांव में करे तेल की सेल,
गली-गली फेरी करे, तेल लेउ जी तेल।
तेल लेउ जी तेल, कड़कड़ी ऐसी बोली,
बिजुरी तड़के अथवा छूट रही हों गाली।

कहं काका कवि, कुछ दिन तक सन्नाटौ छायौ
एक वर्ष तक तेली नहीं गांव में आयौ।

मिल्यौ अचानकर एक दिन, मरियल बाकी चाल,
काया ढीली-पिलपिली, पिचके दोऊ गाल।
पिचके दोनों गाल, गैल में धक्का खावै,
तेल लेउ जी तेल, बकरिया सौ मिमियावै।

हमनें पूछी- ‘यह का हाल है भयौ तेरौ?’
तेली बोल्यौ- ‘काका ब्याह है गयौ मेरौ।’

(साभार: काका की फुलझड़ियां, डायमंड पॉकेट बुक्स, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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07 जनवरी 2009
Jan 03, 2009
काका की कविता में आज का सच छिपा है. यह कटु सच जो क़ुबूल करले वही सुखी है.
KUMAR MANOJ MAUN lucknow
Dec 24, 2008
this msg is verry good......................chandan(C.G.)
CHANDAN KUMAR DURG{C.G.}
Nov 23, 2008
शादी इस महगाई मे सिर्फ़ गाल ही नही सभी कुछ पिचका देगी. मृत्युंजय कुमार राँची
mrityunjay ranchi
Nov 15, 2008
अक्चा है शैलेंद्र मित्तल रतलाम (म.)
shailendra mittal ratlam
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