06 जनवरी 2009
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तेनालीराम और कुएं का विवाह
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(तेनाली राम के बारे में...
1520 ई. में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में राजा कृष्णदेव राय हुआ करते थे। तेनालीराम उनके दरबार में अपने हास-परिहास से लोगों का मनोरंजन किया करते थे। उनकी खासियत थी कि गम्भीर से गम्भीर विषय को भी वह हंसते-हंसते हल कर देते थे।  
     विजयनगर के राजा के पास नौकरी पाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। कई बार उन्हें और उनके परिवार को भूखा भी रहना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी और कृष्णदेव राय के पास नौकरी पा ही ली। तेनालीराम की गिनती राजा कृष्णदेव राय के आठ दिग्गजों में होती है।)

 
तेनालीराम और कुएं का विवाह

तेनाली राम और राजा कृष्णदेव राय में एक बार किसी बात पर कहा-सुनी हो जाने पर तेनाली राम नाराज होकर कहीं चला गया। जब कई दिनों तक वह नहीं लौटा तो राजा को चिंता हुई और उन्होंने उसे खोजने का प्रयत्न किया। तेनाली राम का कहीं पता न चला। अंत में राजा को एक तरकीब सूझी।

उन्होंने अपने राज्य के गांव-गांव में घोषणा करवा दी कि महाराज अपने राजकीय कुएं का विवाह करवा रहे हैं। सभी गांव के मुखियों को आज्ञा दी गई कि वे अपने-अपने गांव के कुओं को लेकर पहुँचे। ऐसा न करने पर दंड के रूप में बीस हजार स्वर्ण मुद्राएं देनी पड़ेगी।

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जिसने सुना, वही हैरान हुआ। भला कुएं भी कहीं ले जाए जा सकते हैं। अवश्य ही महाराज के दिमाग में कुछ खराबी आ गई है। जिस गांव में जाकर तेनाली राम ठहरा था, वहां भी यह घोषणा की गई। मुखिया और गांव के सभी लोग परेशान थे।

तेनाली राम समझ गया कि महाराज ने यह चाल उसे खोजने के लिए ही चली है। उसने मुखिया से कहा, “आप बिल्कुल चिंता न करें। आपने अपने गांव में मुझे आश्रय दिया है। मैं इसका बदला अवश्य चुकाऊंगा। मैं आपको तरकीब बताऊंगा। आप चलने की तैयारी कीजिए।”

तेनाली राम और गांव के चार-पांच व्यक्ति राजधानी को चल दिए। नगर के पास पहुंचकर वे रुक गए और उनमें से एक ने तेनाली राम के बताए हुए उपाय के अनुसार नगर में जाकर कहा, “महाराज, हमारे गांव के कुएं विवाह में शामिल होने के लिए आ गए हैं। वे नगर के बाहर ठहरे हुए हैं और इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि नगर के कुएं आकर उनकी अगवानी करें। उनका स्वागत करें।”

राजा समझ गए कि यह तेनाली राम की ही सूझबूझ है। उन्होंने पूछा, “सचसच बताओ, यह बात तुम्हें किसने बताई है?”

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“महाराज, कुछ दिन पहले हमारे गांव में एक परदेशी आकर ठहरा है? उसी ने यह तरकीब बताई है। वह भी अन्य लोगों के साथ नगर के बाहर आकर ठहरा है।” उस व्यक्ति ने कहा। महाराज स्वयं जाकर बड़ी धूमधाम से तेनालीराम को ले आए। उन्होंने गांव वालों को पुरस्कार देकर हंसी-खुशी विदा किया।

(साभार: तेनालीराम का हास-परिहास, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)


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