(तेनाली राम के बारे में...
1520 ई. में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य में राजा कृष्णदेव राय हुआ करते थे। तेनालीराम उनके दरबार में अपने हास-परिहास से लोगों का मनोरंजन किया करते थे। उनकी खासियत थी कि गम्भीर से गम्भीर विषय को भी वह हंसते-हंसते हल कर देते थे।
विजयनगर के राजा के पास नौकरी पाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। कई बार उन्हें और उनके परिवार को भूखा भी रहना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी और कृष्णदेव राय के पास नौकरी पा ही ली। तेनालीराम की गिनती राजा कृष्णदेव राय के आठ दिग्गजों में होती है।) तेनालीराम को कोड़े मारने की सजाराजा कृष्णदेव राय किसी बात पर तेनाली राम से नाराज हो गए। उन्होंने तेनाली राम से कहा-“कल दरबार में मुंह मत दिखाना। अगर ऐसा किया तो तुम्हें भरे दरबार में कोड़े लगवाए जाएंगे।”
दूसरे दिन राजा को दरबार जाते हुए पता चला कि तेनाली राम दरबार में आया हुआ है और तरह-तरह की उल्टी-सीधी हरकतों और मजाकों से सबको हंसा रहा है। राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। कैसा विचित्र मूर्ख है यह? यह जानते हुए भी दरबार में आ गया है कि इसे कोड़े पड़ेंगे। खैर, आज तो इसे दंड देना ही पड़ेगा।
पढ़ें: तेनालीराम का इम्तिहान जब राजा दरबार में पहुंचे तो उन्होंने देखा कि तेनाली राम सिर पर मिट्टी का एक बड़ा बरतन पहने हुए है, जिस पर तरह-तरह के बेलबूटे बने हुए हैं। उस बरतन से तेनाली राम का सारा सिर और चेहरा ढंक गया था। “यह क्या मजाक है?” राजा ने कहा-“आज तुम्हें मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण कोड़े लगवाए जाएंगे।”
“पर महाराज, मैंने आपकी आज्ञा का उल्लंघन कब किया है? मैंने तो आपके आदेश का पूरी तरह पालन किया है। आपने कहा था कि मैं दरबार में अपना मुंह न दिखाऊं। मैंने तो अपना पूरा चेहरा इस बरतन में छिपा रखा है।”
राजा ठहाका मारकर हंसे और बोले-“विदूषकों और पागलों से नाराज होने से कोई लाभ नहीं।”
(साभार: तेनालीराम का हास-परिहास, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)