07 जनवरी 2009
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काका हाथरसी की चुटकियां
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पक्के गायक

तम्बूरा रे मंचर पर बैठे प्रेमप्रताप,
साज मिले पंद्रह मिनिट, घंटाभर आलाप।

घंटाभर आलाप, राग में मारा गोता,
धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता।
कहें काका, सम्मेलन में सन्नाटा छाया,
श्रोताओं में केवल हमको बैठा पाया।

कलाकार जी ने कहा, होकर भाव-विभोर,
‘काका! तुम संगीत के प्रेमी हो घनघोर’
प्रेमी हो घनघोर, न हमने सत्य छिपाया।
अपने बैठे रहने का कारण बतलाया।

‘कृपा करें श्रीमान मंच का छोड़ें पीछा,
तो हम घर ले जाएं अपने फर्श-गलीचा।’

(साभार: काका की फुलझड़ियां, डायमंड पॉकेट बुक्स, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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07 जनवरी 2009
Dec 06, 2008
वो भी क्या दिन थे जब ककहाथरसी किसी भी कवि सम्मेलन की जान हुआ करते थे. श्रोता सिर्फ़ और सिर्फ़ ककहाथरसी को सुनने जाते थे
sanjiv dehradun
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