06 जनवरी 2009
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मुल्ला नसरुद्दीन की दास्तान –38
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(पिछला भागः  गुलजान पर फिदा मुल्ला नसरुद्दीन..
अब तक आपने पढ़ा, नयाज़ बरतन बेचकर कमाए पैसे मुल्ला को देना चाहता हैं, पर मुल्ला इन्कार कर देता है। नियाज़ के जोर देने पर मुल्ला सिर्फ 35 तंके नयाज से अपनी मजदूरी के तौर पर रख लेता है। कुम्हार के घर काम करते हुए मुल्ला उसकी खूबसूरत बेटी गुलजान से प्यार करने लगता है। अब आगे पढ़िए...।)

गुलजान से मुल्ला की मुलाकात...

तभी छोटे जँगले के पीछे से खाँसने की हल्की- सी आवाज़ सुनाई दी। नसरुद्दीन लौट आया था। ‘अब्बा सो गए है!’ गुलजान ने फुसफुसाकर कहा। एक ही छलांग में मुल्ला नसरुद्दीन ने जंगला पार कर लिया। वे दोनों चिनार के पेड़ों के साये में आ गए।

हरे लिबास में लिपटे लंबे-लंबे पेड़ धीरे-धीरे ऊँघते दिखाई दे रहे थे। नीचे आकाश में चाँद चमक रहा था। उसकी पूरी रोशनी में गुलजान नसरुद्दीन के सामने खड़ी थी। नसरुद्दीन ने बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा,‘मेरी रूह की मलिका, मैंने ज़िंदगी में पहली और आख़िरी बार मुहब्बत की है। मेरी ज़िंदगी तेरा ही इंतज़ार कर रही थी। अब मैंने तुझे पा लिया है। तेरे बिना मैं ज़िंदा नहीं रह सकता।’

‘मुझे यक़ीन है कि तुम यह बात पहली बार नहीं कर रहे हो।’ ‘गुलजान, तूने ऐसा कैसे कहा?’ नसरुद्दीन ने गुस्से से पूछा। नसरुद्दीन के इस गुस्से में सच्चाई थी। गुलजान को विश्वास हो गया। वह अपनी कही बात पर खेद प्रकट करती हुई उसके पास आ बैठी। नसरुद्दीन ने अपने होंठ उसके होंठों से सटा दिए।

‘सुनो, हमारे यहाँ का रिवाज है कि जिस लड़की को चूमते हैं, उसे कोई-न-कोई तोहफ़ा देते हैं। एक हफ़्ते से ज़्यादा हो गया। हर रात तुम मुझे चूमते हो, लेकिन तुमने अभी तक तार का एक टुकड़ा तक नहीं दिया।’ गुलजान ने शिकायत भरे लहजे में कहा।

मेरे पास पैसा नहीं था। आज तुम्हारे अब्बा ने मुझे पैसे दिए हैं। मैं कल ही तुम्हारे लिए एक बढ़िया तोहफ़ा लाऊँगा। बताओ तुम्हें क्या पसंद है? मोती, रूमाल या बिल्लौर जड़ी अंगूठी?

‘कुछ भी सही, तुम्हारा जो भी तोहफ़ा हो, वही बहुत है। मैं तो तुम पर उसी वक़्त निछावर हो गई थी, जब पहली बार बाज़ार में तुम हमारे पास आए थे। जब तुमने उस बदमाश सूदख़ोर जाफ़र को भगाया था, मेरा प्यार और भी बढ़ गया था।’

नसरुद्दीन गुलजान से और सटकर बैठ गया। उसने अपना हाथ बढ़ाया और हथेली से उसका उभरा हुआ नर्म गुदगुदा सीना थाम लिया। उसकी साँस रुक गई। उस पर जादू सा छा गया। तभी उसकी आँखों के आगे चिंगारियाँ उड़ने लगीं। उसका गल झनझना उठा।

‘बदतमीज?’ गुलजान ने टोककर कहा, ‘यही क्या कम बात है कि मैं लाज-शर्म छोड़कर बिना बुर्के के तुम्हारे  सामने आ जाती हूँ। तुम अपने लंबे हाथ उधर क्यों बढ़ाते हो, जिधर तुम्हें नहीं बढ़ाने चाहिए।’ ‘मेहरबानी करके यह बता दो कि यह किसने तय किया है कि हाथ किधर बढ़ाने चाहिए, किधर नहीं? अगर तुमने सबसे बड़े आलिम इब्न तुफ़ैल की किताबें पढ़ी होतीं?’

‘खुदा का शुक्र है कि मैंने ऐसी गंदी किताबें नहीं पढ़ीं।’ गुलजान क्रुद्ध होकर बीच में ही बोल पड़ी।’ मैं इज्जत की हिफ़ाजत करती हूँ, जो हर शरीफ़ लड़की को करनी चाहिए।’

वह उसके पास से तेज़ी से चली गई। जी़ने की सीढ़ियाँ उसके धीमे कदमों से चरमराई और फिर बारजे की झिरीदार खिड़की से रोशनी आती दिखाई देने लगी। मैंने उसके मन को ठेस पहुँचाई। मैं बहुत बड़ा बेवकूफ़ हूँ। कोई बात नहीं कम-से-कम यह पता तो लग गया कि उसका स्वभाव कैसा है।

अगर वह इस तरह मेरे तमाचा मार सकती है तो किसी और के भी जड़ सकती है। वह बहुत ही वफ़ादार बीवी साबित होगी। जिस तरह शादी से पहले वह मेरे तमांचे मार सकती है, अगर शादी के बाद इसी तरह दूसरों के भी तमाचे मार सके तो मुझे बड़ी तसल्ली होगी। पंजे के बल चलकर वह बारजे तक पहुँचा। उसने हल्के से पुकारा, ‘गुलजान! गुलजान।’

खुशबू, अँधेरा और ख़ामोशी। नसरुद्दीन उदास हो उठा। और इतनी धीमी आवाज़ में एक प्यारा भरा गीत गाने लगा कि नयाज के कानों तक उसकी आवाज न पहुँच पाए। वह गाता रहा। लेकिन गुलजान ने न तो कुछ कहा और न सामने ही आई।

उसे विश्वास था कि ऐसा प्यार भरा गीत सुनकर कोई भी लड़की बैठी नहीं रह सकती। वह ज़रूर सुन रही होगी। उसका अनुमान सही था। कुछ देर बाद झिलमिली थोड़ी सी खुली। ‘आओ,’ गुलजान से फुसफुसाकर कहा, ‘लेकिन धीरे से आना। कहीं अब्बा जाग न जाएँ।’ वह ज़ीना चढ़कर ऊपर पहुँचा और उसके पास जा बैठा। वे दोनों बातें करने लगे।

क्रमश: ...

तोहफे की तलाश में मुल्ला...


(साभारः मुल्ला नसरुद्दीन, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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06 जनवरी 2009
Oct 15, 2008
भाई वाह. क्या मज़ेदार मोड़ पर है कहानी.. उर्दू मे भी उत्तेजक कहानी लिखी जाती है ये मुझे पता नही था. खुदा के वास्ते आगे की कहानी जल्दी प्रकाशित करें. ...
Mulla Nasrudeen Indianapolis
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