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मुल्ला नसरुद्दीन की दास्तान –33
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(पिछला भागः कहवाखाने में नीलामी...
तभी उधर से सूदखो़र जाफ़र गुज़रा। उसका थैला सोने-चाँदी के जे़वरों से फूल रहा था। ये जे़वर उसने गुलजान के लिए खरीदे थे। एक घंटे का दिया हुआ वक़्त ख़त्म हो रहा था। सूदखो़र बड़ी बेताबी से जल्दी-जल्दी जा रहा था। लेकिन नसरुद्दीन की नीलामी की आवाज़ सुनते ही वह लालच में फँस गया। उसे देखते ही लोग एक ओर हट गए, क्योंकि हर तीसरा आदमी उसका क़र्जदार था। अब आगे पढ़िए...।)
मुल्ला ने चुकाया कर्ज, टूटी गुलामी की जंजीर...
भीड़ के सामने ही कुम्हार अपनी बेटी के साथ एक पत्थर पर बैठा था। कुम्हार उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखों की रही-सही आस भी बुझ गई। गुलजान ने एक आह भरी। ऐसी दर्द भरी आवाज़ में बोली, जिसे सुनकर पत्थर भी रोने लगते, ‘अब्बा, हम बर्बाद हो गए।’
लेकिन सूदखो़र जाफ़र तो पत्थर से भी कठोर था। उसके चेहरे पर क्रूरता भरी विजय झलक रही थी। उसने कहा, ‘नयाज, मियाद ख़त्म हो गई। अब तुम मेरे गुलाम हो। और तुम्हारी बेटी मेरी गुलाम रखैल है।’
नसरुद्दीन को नीचा दिखाने और चोट पहुँचाने के लिए उसने मालिकों जैसे अंदाज़ में गुलजान के चहरे पर से नकाब हटा दिया। ‘देखो, यह ख़ूबसूरत है ना? आज मैं इसी के साथ सोऊँगा। अब बताओ, किसे किससे जलन होनी चाहिए?’ ‘सचमुच लड़की ख़ूबसूरत है। लेकिन क्या तुम्हारे पास कुम्हार की रसीद है?’
‘रसीद के बिना कोई कैसे काम कर सकता है। सभी चोर और धोखेबाज़ हैं।’ जाफ़र ने कहा और रसीद दिखाते हुए बोला, ‘यह यही रसीद, जिस पर कर्ज़ की रक़म और उसे चुकाने की तारीख़ लिखी है। नीचे कुम्हार के अंगूठे का निशान है।’
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, ‘हाँ, रसीद तो ठीक है। अब रसीद के मुताबिक अदायगी के आप गवाह बन जाइए।’ फिर नसरुद्दीन ने रसीद फाड़कर फेंक दी और रक़म सूदखो़र को गिन दी। नयाज और उसकी बेटी ख़ुशी और अचंभे से खड़े थे। सूदखो़र गुस्से से पत्थर की मूर्ति बन गया। गवाहों ने एक-दूसरे को आँख मारी और बदनाम सूदखो़र की हार पर खुश होकर हँसने लगे।
नसरुद्दीन ने कान के पीछे से चेरी निकाली और सूदख़ोर की ओर आँख मारकर मुँह में रख ली। फिर होंठ चटखाने लगा। सूदखो़र का बदनुमा बदन काँपने लगा। उसकी अच्छी वाली आँख गुस्से से बाहर को उबल आई। उसका कूबड़ काँपने लगा।
उसने तुतलाकर कहा, ‘मुझे अपना नाम तो बता दो, ताकि मुझे यह मालूम हो जाए कि मैं किसके लिए बद्दुआ करूँ?’ नसरुद्दीन का चेहरा चमक रहा था। उसने स्पष्ट और ऊँची आवाज़ में कहा, ‘बगदाद में, तेहरान में, इस्तम्बूल और बुखारा में, मुझे हर शहर में लोग एक ही नाम से जानते हैं और वह नाम है- मुल्ला नसरुद्दीन।’
सूदखो़र डर के मारे सफ़ेद पड़ गया। फिर पीछे की ओर हटते हुए बोला, ‘नसरुद्दीन?’ और अपने मजदूर को खदेड़ते हुए भागने लगा। आसपास खड़े लोग ऊँची आवाज़ में खुशी से बोल उठे, ‘नसरुद्दीन-नसरुद्दीन।’ नक़ाब के पीछे गुलजान की आँखें चमक उठीं। बूढ़ा नयाज अभी तक अपने-आपको सँभाल नहीं पाया था। वह हवा में हाथ हिलाते हुए मिनमिनाने लगा।
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अमीर की अदालत में सूदखोर जाफर
(साभारः मुल्ला नसरुद्दीन, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)
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पाठकों की राय 21 नवम्बर 2008